Friday, September 14, 2007

पत्थरों के शहर की बातें


शहर की पहचान तो है “थार मरुस्थल का द्वार” के रुप में और आंकडे आपको बतायें की यहां पाए जाने वाले वन्य जीवों की विविधता तो किसी अभयारण्य से कम नही है तो इसे आप क्या कहेंगे? यकीं कीजिये इसे “जोधपुर” ही कहेंगे। मेहमाननवाजी के लिए मशहूर इस शहर के बाशिंदे जिस उत्सुकता से Hollywood के सितारों की अगुवानी कर रहे हैं उससे कही ज़्यादा वे अपने आस-पास पसरी वन्य-जीवो की विविधता को संरक्षित कर रहे हैं।




“भले ही ये विरोधाभासी वक्तव्य लगे परंतु वास्तव में रेगिस्तान के किनारे बसा जोधपुर वे सभी खूबियां रखता है जिनके आधार पर इसे “सिटी-संक्चुरी” का विशेषण दिया जा सके.” ये कहते हुवे प्राणी विज्ञानी अनिल छंगानी अपने शोध के नतीजे आगे रखते हैं । “देश का ये एक-मात्र शहर है जिसके आबादी क्षेत्र और आस-पास तकरीबन सभी प्रकार के मरुस्थलीय वन्य-जीव, सरीसृप एवं पक्षी पाए जाते हैं। हम अगर केवल पक्षियों की बात करे तो जोधपुर में इनकी १६० प्रजातियों का पाया जाना सिद्ध हो चुका है।”



हिमालय की तलहटियों से इंदिरा गाँधी नहर और पाइप लाईन के जरिये जोधपुर मे पहुंचे पानी की बदौलत लबालब जोधपुर की कायलाना झील के किनारे इस शहर की पारिस्थितिकी का एक नया रंग भी देखा जा सकता है. यहाँ पर वर्षा-वनों में पाए जाने वाले पक्षी और हिमालयन प्रजाति की मछलियाँ भी देखी जाने लगी हैं।




छंगानी अपने शोध के परिणामों को थोडा विस्तार देते हुए बताते हैं कि जोधपुर शहर और इसकी परिधि से लगते इलाकों में ऐसे “सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र” विकसित हो चुके हैं जिनमे वन्य जीवों के संरक्षण और संवर्धन का सिलसिला बिना किसी सरकारी प्रयत्नों के अच्छी तरह जारी है. बढती आबादी और शहरीकरण के बावज़ूद शहर की गोद में बसें छोटे “वन-खण्ड” जीव-सम्पदा के संरक्षण का अनूठा उदहारण हैं।




एक तरफ शहर के आस-पास खेजडली, धवा, गुडा विश्नोइया, झालामंड, सालावास और बैजनाथ जैसे इलाक़े धार्मिक और सामुदायिक मान्यताओ कि चलते वन्य जीवों को बचाए हुए हैं वही दूसरी तरफ पुराने शहर के लोग मंदिरों, पिकनिक स्थलों और ऐतिहासिक स्मारकों कि आस-पास उपस्थित जैव-विविधता को सहेजे हुए हैं. हाल में हुए अध्ययन कि दौरान छंगानी ने कृष्ण मृग, भेडिया, सियार, साही, लंगूर, चिंकारा, लोमडी, नेवले के साथ ही लुप्त प्रायः प्रजाति के गिद्ध, गोह, चमगादड और काले नाग कि उपस्थिति दर्शायी. शहर कि बीचों-बीच स्थित भूतेश्वर वन-खण्ड में इनमे से अधिकांश वन्य-जीव सहज ही देखे जा सकते हैं।




इतिहासकार मोहन लाल गुप्ता के अनुसार, “कंक्रीट जंगल में तब्दील होते शहरों की भीड़ में जोधपुर ने अभी तक इन वन्य-जीवों को अपने से जुदा नही होने दिया है। इसका श्रेय यहां की परंपराओ और लोक-व्यवहार मे रची-बसी मान्यताओ को जाता है.” अल सुबह से ले कर शाम ढलने तक किसी ना किसी रुप में शहर और इसके आस-पास वन्य-जीवों को समर्पित कई गतिविधिया देखी जा सकती हैं. उन्हें दाना और खाना खिलाते लोग, चीलों के लिए गुलगुले उछालते, मछलियों को आटा डालते, घर-घर घूम कर बंदरो के लिए फल-सब्जियाँ एकत्रित करते लोग बडे जतन से इन गतिविधियों मे संलग्न हैं।




सांस्कृतिक संस्था- मांड के गोविन्द कल्ला एक और विशेषता की और ध्यान आकर्षित करते हैं. “जोधपुर शहर की पुरानी हवेलियो की स्थापत्य कला मारवाडियों के वन्य जीव प्रेम को सिद्ध करती है. सभी हवेलियो के बाहरी दीवारों पर पक्षियों और गिलहरियो के रहने के लिए स्थान विशेष डिज़ाइन सहित बनाए जाते थे. ये भवन निर्माण से जुडा मानो एक अघोषित सा नियम था जिसके कारण आबादी बढने के बावजूद पक्षियों को अपना आशियाना बसाने मे तकलीफ नही हुयी।”




इतना ही नहीं, विशिष्ठ प्रजाति के वन्य जीवों ने अपने अपने दायरे भी निश्चित कर रखे हैं. काले मुँह वाले लंगूर मंडोर, चान्द्पोल, कायलाना और इसके आस-पास के शिवालयो मे अपना जमावड़ा किये हुए हैं. कृष्ण मृग (ज़ाहिर है आपको इस समय सलमान खान याद आये होंगे), नील गाय, लोमड़ियाँ और सियार आदि खेजडली, गुडा सालावास से ले कर विश्व-विद्यालय के नए परिसर तक फैले हुए हैं. इसके अलावा मचिया सफारी पार्क, मंडलनाथ, सिद्धनाथ आदि स्थल “बर्ड-पॉइंट्स” के रुप में अपनी पहचान बना चुके हैं।




दूसरे शहरों से ज़रा हट कर यहां पर सभी प्रजातियों के वन्य जीवों के लिए व्यक्तिगत या सामूहिक प्रयास होते देखे जा सकते हैं. ये बात अलग है की कुतों के मामले में ये जीव-दया वाला मामला नकारात्मक परिणाम ला रह है. शहर की गलियों में आवारा कुत्तों की भरमार है और जोधपुर नगर निगम के बहु-प्रचारित “कुत्ता नसबंदी अभियान” के बावजूद उनकी संख्या में कोई कमी नही आयी है. आज भी बड़ी संख्या में लोग सुबह सवेरे दुपहिया वाहन या टैक्सी मे सवार हो कर निकलते हैं और सड़क के दोनो तरफ खडे कुत्तों को बाजरे की रोटियां खिलाते जाते हैं. मुख्य मार्ग पर कब्जा जमाये कुत्ते ८-९ बजे तक इतने धाप चुके होते हैं की उसके बाद वे अपने आस-पास डाली गयी रोटी को मुँह उठा कर भी नहीं देखते. कई स्वयंसेवी संस्थान तो बंदरो के लिए फल-संग्रहन का दैनिक कार्यक्रम कई वर्षो से जारी रखे हुए हैं।




भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की मरू प्रादेशिक शाखा से जुडे एन एस राठौड़ उन प्रयत्नों का उल्लेख करते हैं जिनके चलते जोधपुर की फिजा में सुरीला पक्षियों की मीठी बोली घुल सी गयी है. अनके अनुसार जोधपुर मे कोयल की अच्छी खासी संख्या मौजूद है पर ये बहुत कम लोग जानते हैं की केंद्रीय रूक्ष अनुसंधान संस्थान (काजरी) की स्थापना के कुछ वर्ष बाद कोयल के जोडों को यहां ला कर छोड़ा गया और उनकी संख्या वृद्धि के प्रयास किये गए।

जय नारायण व्यास विश्वविध्यालय के साथ वन विभाग, एरिड फॉरेस्ट रिसर्च इंसटीटयूट के विशेषज्ञों ने भी अपनी भूमिका निभाई और एम्.एल. रून्वाल, ईश्वर प्रकाश और एस.एम्. मोहनोत जैसे प्राणी-शास्त्रियों ने इसे आगे बढाया।




पर भविष्य उतना सहज नही है जितना वर्तमान नज़र आ रह है. इंदिरा गाँधी नहर परियोजना के जरिये पानी की साल भर आवक ने कायलाना झील के आस-पास की पारिस्थितिकी को बदल दिया है. हिमालयन प्रजाति के पक्षी और जलचर यहां खूबसूरती को तो बढ़ा रहे हैं परंतु प्राणी विशेषज्ञों की चिन्ता है की ये बदलाव स्थानीय प्रजाति के लिए खतरा पैदा नही कर दे. फिर सहजता से उपलब्ध पानी ने कुओं-बावड़ियों जैसे परंपरागत जल -स्त्रोतों के महत्व को कम कर दिया है. सडको को चौड़ा करने के नाम पर शहरी सीमा में हज़ारो पेड काटे जा रहे हैं . हरे-भरे पेड़ों की कटाई के विरोध में उठने वाली आवाजे नज़र-अंदाज़ की जा रही हैं. जानवरों के प्रति अति-दया का भाव कई बार विपरीत परिणाम दिखाता है. कुत्तों को लड्डू खिलने की आदत उनमे खुजली का रोग फैलाती है. वन्य-जीवों और आवारा पशुओं में भेद नही कर पाने के कारण सड़को को रोक कर बैठने वाली गायों की संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है।



राजस्थान की परम्परो पर शोध कर रहे जयपाल सिंह पूरे विषय मे एक और पक्ष जोड़ते हैं. “अपनी दिल से जुडी हर भावना को गीत-संगीत मे पिरोने वाले ग्रामवासी वन्य-जीवों से प्रेम को भी गीतों में गाते हैं.” जिस वक़्त प्राणी-विज्ञानी पत्थरों के शहर जोधपुर के वन्य-जीव से लगाव की बात बताते हैं तो उसी समय शहर के किनारे बसें गाँव में गीत गूंजता है-“काले म्हारे मोरिया बदला री ताई बेठो रे. आज म्हारो मोरियो मरियोडो पडियो रे...कुण मारियो मोरियो” (कल मेरा मोर वट वृक्ष पर बैठा था...आज वो मृत पड़ा है. मेरे मोर को किसने मार दिया?).” आंकडो, रेगिस्तान मे प्रवेश करती नहर परियोजनाओ, लगातार कट रहे पेड़ों, थार में आती बाढ़ और गली के हर चौथे हिस्से पर काबिज कुत्तों के बीच एक बात तो सुकून देने वाली उभरती है की ...एक शहर मे अभी तक अभयारण्य पसरा है।






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